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mahabharat 3.74.9: यह सुनकर राजा अच्छे घोड़ों से जुते हुए रथ पर सवार होकर विदर्भ की ओर चल पड़े। ये घोड़े वायु के समान वेगवान थे और सौ योजन तक दौड़ सकते थे। इस यात्रा में मैं उनका सारथी था।   |   mahabharat अध्याय 3.74: बाहुक-केशिनी-संवाद   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 74: बाहुक-केशिनी-संवाद  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.74.9 
श्रुत्वैतत् प्रस्थितो राजा शतयोजनयायिभि:।
हयैर्वातजवैर्मुख्यैरहमस्य च सारथि:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर राजा अच्छे घोड़ों से जुते हुए रथ पर सवार होकर विदर्भ की ओर चल पड़े। ये घोड़े वायु के समान वेगवान थे और सौ योजन तक दौड़ सकते थे। इस यात्रा में मैं उनका सारथी था।
 
On hearing this, the king set out for Vidarbha in a chariot drawn by good horses which were as fast as the wind and could run for a hundred yojanas. I was his charioteer in this journey.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)