श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 73: ऋतुपर्णका कुण्डिनपुरमें प्रवेश, दमयन्तीका विचार तथा भीमके द्वारा ऋतुपर्णका स्वागत  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  3.73.24-25 
राजानं राजपुत्रं वा न स्म पश्यति कंचन।
नैव स्वयंवरकथां न च विप्रसमागमम्॥ २४॥
ततो व्यगणयद् राजा मनसा कोसलाधिप:।
आगतोऽस्मीत्युवाचैनं भवन्तमभिवादक:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ उन्हें कोई राजा या राजकुमार दिखाई नहीं दिया। वहाँ ब्राह्मणों का कोई समूह नहीं था। स्वयंवर की कोई चर्चा भी नहीं हो रही थी। तब कोशलनरेश ने मन ही मन कुछ सोचकर विदर्भराज से कहा - 'राजन्! मैं आपका अभिवादन करने आया हूँ।'॥24-25॥
 
He did not see any king or prince there. There was no gathering of Brahmins there. There was no discussion of Swayamvara. Then Koshalnareshan thought something in his mind and said to the King of Vidarbha – ‘King! I have come to greet you.’॥ 24-25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)