श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 73: ऋतुपर्णका कुण्डिनपुरमें प्रवेश, दमयन्तीका विचार तथा भीमके द्वारा ऋतुपर्णका स्वागत  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.73.15 
गुणांस्तस्य स्मरन्त्या मे तत्पराया दिवानिशम्।
हृदयं दीर्यत इदं शोकात् प्रियविनाकृतम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
मैं (सदैव) उनके गुणों का स्मरण करता हूँ और दिन-रात उन्हीं में लीन रहता हूँ। अपने प्रियतम नल के बिना मेरा हृदय उनके वियोग के शोक से विदीर्ण हो रहा है॥15॥
 
I (always) remember his virtues and remain devoted to him day and night. Without my beloved Nala, my heart is torn apart by the grief of his separation. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)