vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 72: ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना
»
श्लोक 8
श्लोक
3.72.8
सर्व: सर्वं न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चन।
नैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित्॥ ८॥
अनुवाद
‘सभी लोग सब कुछ नहीं जानते। संसार में कोई भी सर्वज्ञ नहीं है और न ही किसी एक व्यक्ति के पास सारा ज्ञान है।॥8॥
‘Not all people know all things. No one in the world is omniscient and no one person possesses all the knowledge.॥ 8॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×