श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 72: ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  3.72.36-37 
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि शृणु चेदं वचो मम।
ये च त्वां मनुजा लोके कीर्तयिष्यन्त्यतन्द्रिता:।
मत्प्रसूतं भयं तेषां न कदाचिद् भविष्यति॥ ३६॥
भयार्तं शरणं यातं यदि मां त्वं न शप्स्यसे।
एवमुक्तो नलो राजा न्ययच्छत् कोपमात्मन:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
'अब मैं आपकी शरण में आया हूँ। कृपया मेरी बात सुनिए। यदि आप मुझ भय से पीड़ित और आपकी शरण में आए हुए को शाप न दें, तो संसार में जो लोग आलस्य रहित होकर आपका यश गाएँगे, वे कभी मुझसे नहीं डरेंगे।' कलियुग की यह बात सुनकर राजा नल ने अपने क्रोध पर काबू पा लिया। 36-37
 
'Now I have taken refuge in you. Please listen to me. If you do not curse me, who is suffering from fear and has come to you for refuge, then those people in the world who will sing your glories without laziness will never fear me.' On hearing this from Kaliyug, King Nala controlled his anger. 36-37.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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