श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 72: ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.72.15 
संख्यास्यामि फलान्यस्य पश्यतस्ते जनाधिप।
मुहूर्तमपि वार्ष्णेयो रश्मीन् यच्छतु वाजिनाम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'जनेश्वर! यदि वार्ष्णेय दो क्षण भी इन घोड़ों की लगाम पकड़ लें, तो मैं तुम्हारे सामने ही फलों की गिनती करूँगा।'॥15॥
 
'Janeshwar! If Varshneya can hold the reins of these horses for even two moments, I will count the fruits right in front of you.'॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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