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श्लोक 3.72.12-14  |
ततो रथमवस्थाप्य राजानं बाहुकोऽब्रवीत्।
परोक्षमिव मे राजन् कत्थसे शत्रुकर्शन॥ १२॥
प्रत्यक्षमेतत् कर्तास्मि शातयित्वा बिभीतकम्।
अथात्र गणिते राजन् विद्यते न परोक्षता॥ १३॥
प्रत्यक्षं ते महाराज शातयिष्ये बिभीतकम्।
अहं हि नाभिजानामि भवेदेवं न वेति वा॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| यह सुनकर बाहुक ने रथ रोककर राजा से कहा - 'राजा शत्रुसूदन! आप जो कह रहे हैं, वह अप्रत्यक्ष संख्या है। मैं इस बहेड़े के वृक्ष को काटकर इसके फलों की संख्या प्रत्यक्ष कर दूँगा। महाराज! मैं आपकी आँखों के सामने इस बहेड़े के वृक्ष को काटूँगा। इस प्रकार गिनने से वह संख्या अप्रत्यक्ष नहीं रहेगी। ऐसा किए बिना मैं यह नहीं समझ सकता कि (फलों की) संख्या इतनी है या नहीं।' 12-14। |
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| Hearing this, Bahuka stopped the chariot and said to the king - 'King Shatrusudan! What you are saying is an indirect number. I will cut this baheda tree and make the number of its fruits visible. Maharaj! I will cut this baheda tree in front of your eyes. By counting in this way, that number will no longer be indirect. Without doing this, I cannot understand whether the number (of fruits) is this much or not. 12-14. |
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