श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  3.71.9-10 
इति निश्चित्य मनसा बाहुको दीनमानस:।
कृताञ्जलिरुवाचेदमृतुपर्णं जनाधिपम्॥ ९॥
प्रतिजानामि ते वाक्यं गमिष्यामि नराधिप।
एकाह्ना पुरुषव्याघ्र विदर्भनगरीं नृप॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मन में ऐसा निश्चय करके दीन बाहुक ने हाथ जोड़कर राजा ऋतुपर्ण से इस प्रकार कहा - 'नरेश! नरसिंह! मैंने आपकी आज्ञा सुन ली है; मैं वचन देता हूँ कि मैं एक ही दिन में आपके साथ विदर्भ की राजधानी तक जाऊँगा।'
 
Having made this determination in his mind, the down-hearted Bahuka with folded hands addressed King Rituparna thus - 'Lord of men! Lion of men! I have heard your command; I promise that I shall accompany you to the capital of Vidarbha in a single day.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)