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mahabharat 3.71.4: वह सोचने लगा, 'क्या दमयन्ती ऐसा कह सकती है? अथवा क्या यह भी हो सकता है कि वह दुःखी होकर ऐसा करती हो? क्या उसने मुझे प्राप्त करने के लिए यह महान उपाय सोचा है?॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.71.4 
दमयन्ती वदेदेतत् कुर्याद् दु:खेन मोहिता।
अस्मदर्थे भवेद् वायमुपायश्चिन्तितो महान्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वह सोचने लगा, 'क्या दमयन्ती ऐसा कह सकती है? अथवा क्या यह भी हो सकता है कि वह दुःखी होकर ऐसा करती हो? क्या उसने मुझे प्राप्त करने के लिए यह महान उपाय सोचा है?॥4॥
 
He started thinking, 'Can Damayanti say such a thing? Or is it possible that she might do such a thing out of grief. Could it be that she has thought of this great method to attain me?॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)