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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना
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श्लोक 36
श्लोक
3.71.36
ऐकाग्रॺं च तथोत्साहं हयसंग्रहणं च तत्।
परं यत्नं च सम्प्रेक्ष्य परां मुदमवाप ह॥ ३६॥
अनुवाद
उसकी एकाग्रता, उत्साह, घोड़ों को वश में करने की कला और महान् पुरुषार्थ देखकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई ॥36॥
Seeing his concentration, his enthusiasm, his art of controlling the horses and his great efforts, he felt very happy. ॥ 36॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णविदर्भगमने एकसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें ऋतुपर्णका विदर्भदेशमें गमनविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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