श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.71.28 
उताहोस्विद् भवेद् राजा नल: परपुरंजय:।
सोऽयं नृपतिरायात इत्येवं समचिन्तयत्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'अथवा शत्रु की राजधानी को जीतकर इस रूप में आये राजा नल ही तो नहीं हैं? अवश्य ही वे ही होंगे, ऐसा वार्ष्णेयजी सोचने लगे॥28॥
 
'Or has it not been King Nala himself, who conquered the enemy's capital, come in this form? It must be him, Varshneya began to think in this manner.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)