श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  3.71.25-26 
रथघोषं तु तं श्रुत्वा हयसंग्रहणं च तत्।
वार्ष्णेयश्चिन्तयामास बाहुकस्य हयज्ञताम्॥ २५॥
किं नु स्यान्मातलिरयं देवराजस्य सारथि:।
तथा तल्लक्षणं वीरे बाहुके दृश्यते महत्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
रथ की ध्वनि सुनकर और घोड़ों को वश में करने की कला देखकर वार्ष्णेय बाहुक की अश्वविद्या के विषय में सोचने लगे । 'क्या यह देवराज इन्द्र का सारथि मातलि है ? इस वीर बाहुक में मातलि के महान गुण दिखाई देते हैं । 25-26॥
 
Hearing the sound of the chariot and seeing the art of controlling the horses, Varshneya started thinking about Bahuka's horse science. 'Is this Devraj Indra's charioteer Matali? The great qualities of Matalika are seen in this brave Bahuk. 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)