श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.71.2 
विदर्भान् यातुमिच्छामि दमयन्त्या: स्वयंवरम्।
एकाह्ना हयतत्त्वज्ञ मन्यसे यदि बाहुक॥ २॥
 
 
अनुवाद
'बाहुक! तुम घुड़सवारी की कला में निपुण हो। यदि तुम मेरी बात मानो, तो मैं दमयन्ती के स्वयंवर में भाग लेने के लिए एक ही दिन में विदर्भ की राजधानी पहुँचना चाहता हूँ।'
 
'Bahuka! You are an expert in the art of horsemanship. If you listen to me, I want to reach the capital of Vidarbha in a single day to participate in Damayanti's swayamvara.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)