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mahabharat 3.71.14: वे सिंधुदेश के घोड़े थे, वायु के समान वेगवान। वे निर्दोष थे, क्योंकि उनमें दस आवृत (भँवर) के चिह्न थे। उन्हें देखकर राजा ऋतुपर्ण कुछ क्रोधित हुए और बोले-॥14॥   |   mahabharat अध्याय 3.71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.71.14 
शुद्धान् दशभिरावर्तै: सिन्धुजान् वातरंहस:।
दृष्ट्वा तानब्रवीद् राजा किंचित् कोपसमन्वित:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
वे सिंधुदेश के घोड़े थे, वायु के समान वेगवान। वे निर्दोष थे, क्योंकि उनमें दस आवृत (भँवर) के चिह्न थे। उन्हें देखकर राजा ऋतुपर्ण कुछ क्रोधित हुए और बोले-॥14॥
 
They were horses from Sindhudesh, as swift as the wind. They were flawless because they had the marks of ten Aavrat (whirlpools). Seeing them, King Rituparna became somewhat angry and said -॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)