श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.71.13 
तेजोबलसमायुक्तान् कुलशीलसमन्वितान्।
वर्जिताँल्लक्षणैर्हीनै: पृथुप्रोथान् महाहनून्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वह तेज और बल से संपन्न था। वह उत्तम कुल और उत्तम स्वभाव का था। उसमें अशुभ लक्षण सर्वथा शून्य थे। उसकी नाक मोटी और ठोड़ी चौड़ी थी॥13॥
 
He was endowed with brilliance and strength. He was of good caste and good nature. He was completely devoid of any inauspicious characteristics. His nose was thick and his muzzle (chin) was broad.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)