श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.71.12 
स त्वर्यमाणो बहुश ऋतुपर्णेन बाहुक:।
अश्वाञ्जिज्ञासमानो वै विचार्य च पुन: पुन:।
अध्यगच्छत् कृशानश्वान् समर्थानध्वनि क्षमान्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
ऋतुपर्ण ने बाहुक को बार-बार उकसाया, इसलिए उसने बहुत सोच-विचारकर घोड़ों की परीक्षा की और ऐसे घोड़ों को चुना जो देखने में तो दुबले-पतले थे, परन्तु बलवान थे और मार्ग पर चलने में समर्थ थे।॥12॥
 
Rituparna repeatedly provoked Bahuka, so after careful consideration he tested the horses and selected those that, though thin in appearance, were strong and capable of traversing the path.॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)