श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 70: पर्णादका दमयन्तीसे बाहुकरूपधारी नलका समाचार बताना और दमयन्तीका ऋतुपर्णके यहाँ सुदेव नामक ब्राह्मणको स्वयंवरका संदेश देकर भेजना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  3.70.15-16 
अयमर्थो न संवेद्यो भीमे मात: कदाचन।
त्वत्संनिधौ नियोक्ष्येऽहं सुदेवं द्विजसत्तमम्॥ १५॥
यथा न नृपतिर्भीम: प्रतिपद्येत मे मतम्।
तथा त्वया प्रकर्तव्यं मम चेत् प्रियमिच्छसि॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'माता! पिताजी को यह बात कभी पता नहीं चलनी चाहिए। मैं आपके सामने ही ब्राह्मण सुदेव को इस कार्य में लगाऊँगा। आप ऐसा प्रयत्न करें कि पिताजी को मेरा अभिप्राय पता न चले। यदि आप मुझे प्रसन्न करना चाहती हैं, तो आपको इस बात का ध्यान रखना होगा।॥ 15-16॥
 
‘Mother! Father should never know about this. I will engage Brahmin Sudev in this task in front of you. You should try in such a way that father does not know my intention. If you want to please me, then you will have to be careful about this.॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)