श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 7: दुर्योधन, दु:शासन, शकुनि और कर्णकी सलाह, पाण्डवोंका वध करनेके लिये उनका वनमें जानेकी तैयारी तथा व्यासजीका आकर उनको रोकना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.7.14 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा।
नातिहृष्टमना: क्षिप्रमभवत् स पराङ्मुख:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कर्ण के ऐसा कहने पर राजा दुर्योधन को उस समय अधिक प्रसन्नता नहीं हुई। उसने तुरन्त ही अपना मुख फेर लिया ॥14॥
 
Vaishampayana says - Janamejaya! King Duryodhan was not very happy at that time when Karna said this. He immediately turned his face away. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)