श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 69: दमयन्तीका अपने पिताके यहाँ जाना और वहाँसे नलको ढूँढ़नेके लिये अपना संदेश देकर ब्राह्मणोंको भेजना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.69.33 
अपकृष्य च लज्जां सा स्वयमुक्तवती नृप।
प्रयतन्तां तव प्रेष्या: पुण्यश्लोकस्य मार्गणे॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! उन्होंने स्वयं ही बिना किसी लज्जा के यह बात कही है। अतः आपके सेवक पुण्यश्लोक महाराज को नल को ढूँढ़ने का प्रयत्न करना चाहिए। ॥33॥
 
"O Lord of men! He has said this himself without any shame. Therefore, your servant Punyashloka Maharaja should try to find Nala." ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)