श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 68: विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  3.68.32-33 
रुरोद च भृशं राजन् वैदर्भी शोककर्शिता।
दृष्ट्वा सुदेवं सहसा भ्रातुरिष्टं द्विजोत्तमम्॥ ३२॥
रुदतीं तामथो दृष्ट्वा सुनन्दा शोककर्शिता।
सुदेवेन सहैकान्ते कथयन्तीं च भारत॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
राजन! अपने भाई के प्रिय मित्र द्विजश्रेष्ठ सुदेव को अचानक आते देख दमयन्ती शोक से व्याकुल हो गई और फूट-फूटकर रोने लगी। तत्पश्चात, उसे सुदेव के साथ अकेले में बातें करते और रोते देखकर सुनन्दा शोक से व्याकुल हो गई। 32-33॥
 
Rajan! Seeing her brother's dear friend Dwijashrestha Sudeva suddenly arriving, Damayanti became distraught with grief and started crying bitterly. India Thereafter, Sunanda became distraught with grief after seeing her talking and crying alone with Sudev. 32-33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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