श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 68: विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  3.68.27-28 
बृहदश्व उवाच
एवं विमृश्य विविधै: कारणैर्लक्षणैश्च ताम्।
उपागम्य ततो भैमीं सुदेवो ब्राह्मणोऽब्रवीत्॥ २७॥
अहं सुदेवो वैदर्भि भ्रातुस्ते दयित: सखा।
भीमस्य वचनाद् राज्ञस्त्वामन्वेष्टुमिहागत:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
महर्षि बृहदश्व कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार नाना कारणों और लक्षणों से दमयन्ती को पहचानकर तथा अपने कर्तव्य का विचार करके सुदेव ब्राह्मण उसके पास गया और इस प्रकार बोला - 'विदर्भराज! मैं आपके भाई का प्रिय मित्र सुदेव हूँ। मैं राजा भीम की आज्ञा से आपको खोजने यहाँ आया हूँ।'
 
Sage Brihadashwa says - Yudhishthira! Having thus identified Damayanti by various reasons and characteristics and having thought about his duty, the Brahmin Sudeva went near her and said thus - 'Princess of Vidarbha! I am Sudeva, the dear friend of your brother. I have come here to search for you by the order of King Bhima.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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