श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 68: विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.68.26 
अहमाश्वासयाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम्।
अदृष्टपूर्वां दु:खस्य दु:खार्तां ध्यानतत्पराम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
इस पूर्ण चन्द्रमुख वाली राजकुमारी ने पहले कभी दुःख नहीं देखा। इस समय वह दुःख से आकुल होकर अपने पति के ध्यान में मग्न है, अतः मैं उसे सान्त्वना देने का विचार कर रहा हूँ॥ 26॥
 
This full moon-faced princess has never seen sorrow before. At this moment she is overwhelmed with sorrow and is engrossed in the meditation of her husband, so I am thinking of reassuring her.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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