श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 68: विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.68.22 
कदा नु खलु दु:खस्य पारं यास्यति वै शुभा।
भर्तु: समागमात् साध्वी रोहिणी शशिनो यथा॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जैसे रोहिणी चन्द्रमा के साथ मिलकर प्रसन्न हो जाती है, वैसे ही यह शुभ और गुणवती राजकुमारी अपने पति के साथ मिलकर (संतुष्ट होकर) इस दुःखसागर को कब पार कर सकेगी?
 
Just as Rohini becomes happy by the association with the moon, similarly, when will this auspicious and virtuous princess be able to cross this ocean of sorrow (by becoming satisfied) by the association with her husband?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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