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mahabharat 3.68.20: यदि राजा नल इससे विरक्त होकर अपने शरीर को धारण किए रहें और शोक के कारण दुर्बल न हों तो समझना चाहिए कि वे कोई अत्यंत कठिन कार्य कर रहे हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.68: विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 68: विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.68.20 
दुष्करं कुरुतेऽत्यन्तं हीनो यदनया नल:।
धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनापि सीदति॥ २०॥
 
 
अनुवाद
यदि राजा नल इससे विरक्त होकर अपने शरीर को धारण किए रहें और शोक के कारण दुर्बल न हों तो समझना चाहिए कि वे कोई अत्यंत कठिन कार्य कर रहे हैं।
 
If King Nala, separated from this, holds on to his body and is not getting weakened due to grief, then it should be understood that he is performing an extremely difficult task.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)