श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 68: विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.68.17 
रूपौदार्यगुणोपेतां मण्डनार्हाममण्डिताम्।
चन्द्रलेखामिव नवां व्योम्नि नीलाभ्रसंवृताम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वह सुन्दरता और उदारता आदि गुणों से युक्त है। यद्यपि वह आभूषण धारण करने में समर्थ है, तथापि वह आभूषणों से रहित है, मानो वह काले बादलों से आच्छादित आकाश में अमावस्या हो ॥17॥
 
It is endowed with qualities such as beauty and generosity. Even though it is capable of wearing ornaments, it is devoid of any ornaments, as if it were a new moon phase in the sky covered by dark clouds. ॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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