श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 68: विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.68.16 
सुकुमारीं सुजाताङ्गीं रत्नगर्भगृहोचिताम्।
दह्यमानामिवार्केण मृणालीमिव चोद्‍धृताम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
सुन्दर अंगों वाली यह सुकुमार राजकुमारी उन महलों में रहने के योग्य है, जिनके भीतरी भाग रत्नजड़ित हैं। (इस समय शोक ने उसे इतना दुर्बल कर दिया है कि) वह सरोवर से निकाले हुए तथा सूर्य की किरणों से जले हुए कमल के समान प्रतीत होती है।
 
This delicate princess with lovely body parts is fit to live in those palaces whose interiors are made of gems. (At present, grief has weakened her so much that) she looks like a lotus taken out of the lake and burnt by the rays of the sun.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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