श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 68: विदर्भराजका नल-दमयन्तीकी खोजके लिये ब्राह्मणोंको भेजना, सुदेव ब्राह्मणका चेदिराजके भवनमें जाकर मन-ही-मन दमयन्तीके गुणोंका चिन्तन और उससे भेंट करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.68.12 
चारुपद्मविशालाक्षीं मन्मथस्य रतीमिव।
इष्टां समस्तलोकस्य पूर्णचन्द्रप्रभामिव॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उसके विशाल नेत्र सुन्दर कमलों की शोभा को भी लज्जित कर देते हैं। वह कामदेव के प्रेम के समान सुन्दर लगती है। पूर्णिमा के प्रकाश के समान वह सभी लोगों को प्रिय है। ॥12॥
 
Her large eyes put the beauty of the beautiful lotuses to shame. She looks like the love of Kamadeva. Like the light of the full moon, she is loved by all people. ॥12॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd