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श्लोक 3.67.5  |
ऋतुपर्ण उवाच
वस बाहुक भद्रं ते सर्वमेतत् करिष्यसि।
शीघ्रयाने सदा बुद्धिर्ध्रियते मे विशेषत:॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| ऋतुपर्ण बोले- बाहुक! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरे यहाँ रहो। तुम्हें ये सब कार्य करने होंगे। मेरे मन में सदैव यही विचार रहता है कि मैं शीघ्रता से कहीं पहुँच सकूँ। |
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| Rituparna said— Bahuk! May you be blessed. You stay at my place. You will have to do all these tasks. I always have this thought in mind that I should be able to reach anywhere quickly. 5. |
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