श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 67: राजा नलका ऋतुपर्णके यहाँ अश्वाध्यक्षके पदपर नियुक्त होना और वहाँ दमयन्तीके लिये निरन्तर चिन्तित रहना तथा उनकी जीवलसे बातचीत  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.67.5 
ऋतुपर्ण उवाच
वस बाहुक भद्रं ते सर्वमेतत् करिष्यसि।
शीघ्रयाने सदा बुद्धिर्ध्रियते मे विशेषत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
ऋतुपर्ण बोले- बाहुक! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरे यहाँ रहो। तुम्हें ये सब कार्य करने होंगे। मेरे मन में सदैव यही विचार रहता है कि मैं शीघ्रता से कहीं पहुँच सकूँ।
 
Rituparna said— Bahuk! May you be blessed. You stay at my place. You will have to do all these tasks. I always have this thought in mind that I should be able to reach anywhere quickly. 5.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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