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श्लोक 3.67.15-16h  |
निशाकाले स्मरंस्तस्या: श्लोकमेकं स्म गायति।
स विभ्रमन् महीं सर्वां क्वचिदासाद्य किंचन॥ १५॥
वसत्यनर्हस्तद् दु:खं भूय एवानुसंस्मरन्। |
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| अनुवाद |
| रात्रि में वह उसी का स्मरण करते हुए श्लोक पढ़ता रहता है। सम्पूर्ण जगत् में भ्रमण करने के पश्चात् वह किसी स्थान पर पहुँचता है और वहाँ अपनी प्रियतमा का निरन्तर स्मरण करते हुए कष्ट भोगता रहता है। यद्यपि वह उस कष्ट को भोगने के योग्य नहीं है।॥15 1/2॥ |
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| ‘At night he keeps on reciting a verse remembering her. After roaming around the whole world he reaches some place and keeps on suffering there remembering his beloved continuously. Although he is not worthy of suffering that suffering.॥ 15 1/2॥ |
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