श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 72-73
 
 
श्लोक  3.65.72-73 
सर्वमेतत् करिष्यामि दिष्टॺा ते व्रतमीदृशम्।
एवमुक्त्वा ततो भैमीं राजमाता विशाम्पते॥ ७२॥
उवाचेदं दुहितरं सुनन्दां नाम भारत।
सैरन्ध्रीमभिजानीष्व सुनन्दे देवरूपिणीम्॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
'पुत्री! मैं यह सब करूँगी। यह सौभाग्य की बात है कि तुम्हारा व्रत इतना उत्तम है।' राजा युधिष्ठिर! दमयंती से ऐसा कहकर राजमाता ने अपनी पुत्री सुनन्दा से कहा - 'सुनन्दे! इस सैरन्ध्री को देवी का ही रूप समझो।' 72-73
 
'Daughter! I will do all this. It is a matter of good fortune that your fast is so excellent.' King Yudhishthira! Having said this to Damayanti, the queen mother said to her daughter Sunanda - 'Sunande! Consider this Sairandhri to be a form of Goddess. 72-73.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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