श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  3.65.68 
उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां न कुर्यां पादधावनम्।
न चाहं पुरुषानन्यान् प्रभाषेयं कथंचन॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
‘मैं किसी का जूठा नहीं खाऊँगा, किसी के पैर नहीं धोऊँगा और किसी परपुरुष से किसी प्रकार भी बात नहीं करूँगा ॥ 68॥
 
‘I will not eat anyone's leftovers, I will not wash anyone's feet and I will not talk to any other man in any way.॥ 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)