श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  3.65.66 
अपि वा स्वयमागच्छेत् परिधावन्नितस्तत:।
इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
अथवा यह भी हो सकता है कि वह इधर-उधर भटकता हुआ स्वयं ही यहाँ आ जाए। हे प्रिये! तुम यहीं रहकर अपने पति को प्राप्त करोगी।॥66॥
 
‘Or it is also possible that he may wander here and there and come here on his own. O dear! You will stay here and get your husband.’॥ 66॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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