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श्लोक 3.65.66  |
अपि वा स्वयमागच्छेत् परिधावन्नितस्तत:।
इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे॥ ६६॥ |
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| अनुवाद |
| अथवा यह भी हो सकता है कि वह इधर-उधर भटकता हुआ स्वयं ही यहाँ आ जाए। हे प्रिये! तुम यहीं रहकर अपने पति को प्राप्त करोगी।॥66॥ |
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| ‘Or it is also possible that he may wander here and there and come here on his own. O dear! You will stay here and get your husband.’॥ 66॥ |
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