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mahabharat 3.65.63: मेरे प्रियतम की कांति कमल के भीतरी भाग के समान है। वह देवताओं के समान तेजस्वी, मेरे प्राणों का स्वामी और शक्तिशाली है। बहुत खोजने पर भी मैं न तो अपने प्रियतम को देख पाया हूँ और न ही उसका पता लगा पाया हूँ॥ 63॥   |   mahabharat अध्याय 3.65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  3.65.63 
साहं कमलगर्भाभमपश्यन्ती हृदि प्रियम्।
न विन्दाम्यमरप्रख्यं प्रियं प्राणेश्वरं प्रभुम्॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
मेरे प्रियतम की कांति कमल के भीतरी भाग के समान है। वह देवताओं के समान तेजस्वी, मेरे प्राणों का स्वामी और शक्तिशाली है। बहुत खोजने पर भी मैं न तो अपने प्रियतम को देख पाया हूँ और न ही उसका पता लगा पाया हूँ॥ 63॥
 
‘The radiance of my beloved is like the inner part of a lotus. He is as radiant as the gods, the master of my life and powerful. Despite searching a lot, I have neither been able to see my beloved nor find his whereabouts.'॥ 63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)