श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  3.65.58-59 
द्यूते स निर्जितश्चैव वनमेक उपेयिवान्।
तमेकवसनं वीरमुन्मत्तमिव विह्वलम्॥ ५८॥
आश्वासयन्ती भर्तारमहमप्यगमं वनम्।
स कदाचिद् वने वीर: कस्मिंश्चित् कारणान्तरे॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
'और उसमें सब कुछ हारकर वे अकेले ही वन को चले गए। केवल एक वस्त्र धारण करके तथा उन्मत्त और व्याकुल अपने वीर स्वामी को सांत्वना देते हुए मैं भी उनके साथ वन को चला गया। एक दिन की बात है, मेरे वीर स्वामी किसी कारणवश वन को चले गए॥ 58-59॥
 
‘And having lost everything in that, he left for the forest alone. Wearing only one garment and consoling my brave master who was mad and distraught, I too accompanied him to the forest. It is a matter of one day, my brave master went to the forest for some reason.॥ 58-59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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