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श्लोक 3.65.57  |
भक्ताहमपि तं वीरं छायेवानुगता पथि।
तस्य दैवात् प्रसङ्गोऽभूदतिमात्रं सुदेवने॥ ५७॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे मार्ग में पथिक के पीछे छाया चलती है, वैसे ही मैं भी अपने वीर पति के प्रति भक्ति रखती हूँ और सदैव उनके पीछे-पीछे चलती हूँ। दुर्भाग्यवश एक दिन मेरे पति को जुआ खेलने का बहुत शौक हो गया॥ 57॥ |
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| ‘Just as a shadow follows a traveller on the road, similarly I too have devotion for my brave husband and always follow him. Unfortunately one day my husband became very fond of gambling.॥ 57॥ |
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