श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  3.65.56 
फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम्।
असंख्येयगुणो भर्ता मां च नित्यमनुव्रत:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
'मैं अकेला हूँ, फल-मूल खाकर रहता हूँ और जहाँ संध्या होती है, वहीं रहता हूँ। मेरे स्वामी असंख्य गुणों वाले हैं, वे मुझ पर सदैव अत्यन्त स्नेह करते हैं॥ 56॥
 
'I am alone, I live by eating fruits and roots and wherever the evening falls I stay there. My lord has innumerable virtues, he is always very fond of me.॥ 56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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