श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 51-52
 
 
श्लोक  3.65.51-52 
उन्मत्तवेषा कल्याणी श्रीरिवायतलोचना।
सा जनं वारयित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम्॥ ५१॥
आरोप्य विस्मिता राजन् दमयन्तीमपृच्छत।
एवमप्यसुखाविष्टा बिभर्षि परमं वपु:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
'उसका रूप तो पागलों जैसा है, परन्तु बड़े-बड़े नेत्रों वाली यह युवती तो धन की देवी के समान शुभ प्रतीत होती है।' धाय ने सब लोगों को एक ओर धकेल दिया और उसे राजमहल के ऊपरी चबूतरे पर ले गई। हे राजन! तब राजमाता ने आश्चर्यचकित होकर दमयन्ती से पूछा - 'अहा! इतने दुःख से दबी हुई होने पर भी तुम इतना सुन्दर रूप कैसे धारण करती हो?'॥ 51-52॥
 
'Her appearance is like that of a madman, but this young lady with large eyes looks like the auspicious goddess of wealth.' The nurse pushed aside all the people and took her to the upper terrace of the royal palace. O King! Then the queen mother, astonished, asked Damayanti - 'Oh! How do you assume such a beautiful form even when you are so burdened with grief?॥ 51-52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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