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श्लोक 3.65.47-48  |
उन्मत्तामिव गच्छन्तीं ददृशु: पुरवासिन:।
प्रविशन्तीं तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरीं तदा॥ ४७॥
अनुजग्मुस्तत्र बाला ग्रामिपुत्रा: कुतूहलात्।
सा तै: परिवृतागच्छत् समीपं राजवेश्मन:॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| नगर के लोगों ने उसे उन्मत्त होकर जाते देखा। उसे चेदिन राजा की राजधानी में प्रवेश करते देख, कौतुहलवश अनेक ग्राम-बालक उसके साथ हो लिए। उनसे घिरी हुई दमयन्ती राजमहल के निकट पहुँची। 47-48 |
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| The people of the city saw him going like a madman. Seeing him entering the capital of Chedin king, many village children had joined him out of curiosity. Surrounded by them Damayanti went near the royal palace. 47-48. |
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