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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.65.46 
अथ वस्त्रार्धसंवीता प्रविवेश पुरोत्तमम्।
तां विह्वलां कृशां दीनां मुक्तकेशीममार्जिताम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
वह उस अद्भुत शहर में आधे शरीर पर साड़ी लपेटे हुए दाखिल हुई थी। वह व्यथित, दुखी और कमज़ोर महसूस कर रही थी। उसके बाल बिखरे हुए थे। उसने स्नान नहीं किया था।
 
She entered that wonderful city with only half her body wrapped in a sari. She was feeling distressed, miserable and weak. Her hair was loose. She had not taken a bath.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)