श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  3.65.44-45 
हतशेषै: सह तदा ब्राह्मणैर्वेदपारगै:।
अगच्छद् राजशार्दूल चन्द्रलेखेव शारदी॥ ४४॥
गच्छन्ती साचिराद् बाला पुरमासादयन्महत्।
सायाह्ने चेदिराजस्य सुबाहो: सत्यदर्शिन:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वह सुन्दरी कन्या शरद् ऋतु के चन्द्रमा की कला के समान मृत्यु से बचे हुए वेदवेत्ता ब्राह्मणों के साथ भ्रमण करती हुई कुछ ही समय में संध्या के समय सत्यदर्शी चेदिराज सूबा की राजधानी में पहुँच गई ॥44-45॥
 
The best! Thereafter, that beautiful girl, like the art of the autumn moon, traveling with the learned Brahmins of the Vedas who were saved from death, in a short time reached the capital of Satyadarshi Chediraj Subah by the evening. 44-45॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd