श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 41-43
 
 
श्लोक  3.65.41-43 
मन्ये स्वयंवरकृते लोकपाला: समागता:॥ ४१॥
प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्यार्थाय देवता:।
नूनं तेषां प्रभावेण वियोगं प्राप्तवत्यहम्॥ ४२॥
एवमादीनि दु:खार्ता सा विलप्य वराङ्गना।
प्रलापानि तदा तानि दमयन्ती पतिव्रता॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
‘मैं सोचती हूँ कि नल के कारण ही मैंने स्वयंवर में उपस्थित देवताओं का तिरस्कार किया था। निश्चय ही उन्हीं देवताओं के प्रभाव से मुझे आज वियोग का दुःख सहना पड़ रहा है।’ इस प्रकार सुन्दरी एवं पतिव्रता दमयन्ती उस समय शोक से विह्वल होकर अनेक प्रकार से विलाप करने लगी।
 
'I think that because of Nala I had rejected the gods who were present for the swayamvara. It is surely due to the influence of those gods that I have to bear the pain of separation today.' Thus, the beautiful and faithful Damayanti, overwhelmed with grief, at that time wept and wailed in many ways. 41-43.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd