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mahabharat 3.65.40-41h: ‘इस संसार में मनुष्यों को ऐसा कोई सुख या दुःख नहीं मिलता जो विधाता ने न दिया हो। मैंने बचपन में भी मन, वाणी या कर्म से ऐसा कोई पाप नहीं किया है जिससे मुझे यह दुःख हुआ हो। ॥40 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 40-41h
 
 
श्लोक  3.65.40-41h 
न ह्यदैवकृतं किंचिन्नराणामिह विद्यते।
न च मे बालभावेऽपि किंचित् पापकृतं कृतम्॥ ४०॥
कर्मणा मनसा वाचा यदिदं दु:खमागतम्।
 
 
अनुवाद
‘इस संसार में मनुष्यों को ऐसा कोई सुख या दुःख नहीं मिलता जो विधाता ने न दिया हो। मैंने बचपन में भी मन, वाणी या कर्म से ऐसा कोई पाप नहीं किया है जिससे मुझे यह दुःख हुआ हो। ॥40 1/2॥
 
‘In this world, humans do not get any happiness or sorrow that is not given by the Creator. Even in my childhood, I have not committed any sin by thought, speech or action that would have caused me this sorrow. ॥ 40 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)