श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.65.39 
नाप्राप्तकालो म्रियते श्रुतं वृद्धानुशासनम्।
या नाहमद्य मृदिता हस्तियूथेन दु:खिता॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
'जिसकी मृत्यु का समय नहीं आया है, वह चाहकर भी नहीं मर सकता। मैंने वृद्धों से जो उपदेश सुना है, वह उचित प्रतीत होता है, इसीलिए आज पीड़ा सहते हुए भी मैं हाथियों के झुंड से कुचलकर नहीं मर सका।'
 
‘One whose time of death has not come cannot die even if he wishes to. The advice I have heard from the old men seems to be correct, that is why today, in spite of being in pain, I could not be crushed to death by a herd of elephants.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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