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mahabharat 3.65.37-38: विदर्भ की राजकुमारी दमयंती भी विलाप करने लगी कि 'मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है कि इस निर्जन वन में समुद्र के समान विशाल जनसमूह एकत्रित किया था, किन्तु मेरे दुर्भाग्य से वे हाथियों के झुंड द्वारा मारे गए। मुझे अवश्य ही दीर्घकाल तक घोर दुःख भोगना पड़ेगा।'   |   mahabharat अध्याय 3.65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  3.65.37-38 
अशोचत् तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम्।
योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये सम्प्राप्तोऽयं जनार्णव:॥ ३७॥
स हतो हस्तियूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तत्।
प्राप्तव्यं सुचिरं दु:खं नूनमद्यापि वै मया॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
विदर्भ की राजकुमारी दमयंती भी विलाप करने लगी कि 'मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है कि इस निर्जन वन में समुद्र के समान विशाल जनसमूह एकत्रित किया था, किन्तु मेरे दुर्भाग्य से वे हाथियों के झुंड द्वारा मारे गए। मुझे अवश्य ही दीर्घकाल तक घोर दुःख भोगना पड़ेगा।'
 
Damayanti, the princess of Vidarbha, also started lamenting that 'What sin have I committed that in this lonely forest, I had gathered a sea-like crowd, but due to my misfortune, they were killed by a herd of elephants. I will surely have to suffer a lot for a long time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)