श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.65.33 
नूनं जन्मान्तरकृतं पापमापतितं महत्।
अपश्चिमामिमां कष्टामापदं प्राप्तवत्यहम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
‘निश्चय ही यह मेरे पूर्वजन्मों में किए हुए पापों का महान फल है, जिसके कारण मैं इस अनंत दुःख में पड़ा हूँ।॥33॥
 
‘Surely this is the great consequence of the sins I have committed in my previous lives, due to which I have fallen into this infinite suffering.॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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