श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.65.32 
न स्मराम्यशुभं किंचित् कृतं कस्यचिदण्वपि।
कर्मणा मनसा वाचा कस्येदं कर्मण: फलम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
‘मुझे स्मरण नहीं आता कि मैंने मन, वचन या कर्म से किसी को किंचितमात्र भी हानि पहुँचाई हो। फिर मेरे कर्मों का क्या फल है जो मुझे यह सब मिल रहा है?॥ 32॥
 
‘I do not remember having caused the slightest harm to anyone by my thoughts, words or actions. Then what is the result of my actions that I am getting these?॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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