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mahabharat 3.65.31: 'हे! विधाता मुझ पर अत्यंत क्रुद्ध और अत्यंत क्रोधित हैं, जिससे मेरा कहीं भी कल्याण नहीं हो रहा है। मैं नहीं जानता, यह हमारे किस कर्म का फल है?॥31॥   |   mahabharat अध्याय 3.65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.65.31 
अहो ममोपरि विधे: संरम्भो दारुणो महान्।
नानुबध्नाति कुशलं कस्येदं कर्मण: फलम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'हे! विधाता मुझ पर अत्यंत क्रुद्ध और अत्यंत क्रोधित हैं, जिससे मेरा कहीं भी कल्याण नहीं हो रहा है। मैं नहीं जानता, यह हमारे किस कर्म का फल है?॥31॥
 
'Oh! The Creator is extremely furious and extremely angry with me, due to which I do not get any well-being anywhere. I do not know, which of our deeds is this the result of?॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)