श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  3.65.29-30 
दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं तेषां सुदारुणम्॥ २९॥
ह्रीता भीता च संविग्ना प्राद्रवद् यत्र काननम्।
आशङ्कमाना तत्पापमात्मानं पर्यदेवयत्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
उसके अत्यन्त भयंकर वचन सुनकर दमयन्ती लज्जित और भयभीत हो गई। उसके पाप-प्रणय के फलित होने के भय से वह उस ओर भाग गई, जहाँ घना वन था। वहाँ जाकर वह अपनी स्थिति पर विचार करके विलाप करने लगी॥29-30॥
 
'Hearing his most horrific words, Damayanti was filled with shame and was overcome with fear. Fearing that his sinful intentions might materialise, she fled to the direction where the thick forest was. Going there, she began to lament, contemplating her situation.॥29-30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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