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mahabharat 3.65.25-26: अन्य लोग, जो अपने परिवार और धन के नष्ट होने से विवश होकर यह कहने लगे कि, 'आज जो स्त्री पागल सी दिखाई दे रही थी और हमारी विशाल भीड़ के साथ आई थी, वह राक्षसी रूप वाली राक्षसी थी; परन्तु वह अलौकिक सुन्दर रूप धारण करके हमारे समूह में आई थी। उसने पहले ही यह अत्यन्त भयंकर माया फैला दी थी।॥ 25-26॥   |   mahabharat अध्याय 3.65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 65: जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दु:खित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  3.65.25-26 
अपरे त्वब्रुवन् दीना ज्ञातिद्रव्यविनाकृता:।
यासावद्य महासार्थे नारी ह्युन्मत्तदर्शना॥ २५॥
प्रविष्टा विकृताकारा कृत्वा रूपममानुषम्।
तयेयं विहिता पूर्वं माया परमदारुणा॥ २६॥
 
 
अनुवाद
अन्य लोग, जो अपने परिवार और धन के नष्ट होने से विवश होकर यह कहने लगे कि, 'आज जो स्त्री पागल सी दिखाई दे रही थी और हमारी विशाल भीड़ के साथ आई थी, वह राक्षसी रूप वाली राक्षसी थी; परन्तु वह अलौकिक सुन्दर रूप धारण करके हमारे समूह में आई थी। उसने पहले ही यह अत्यन्त भयंकर माया फैला दी थी।॥ 25-26॥
 
The other people, who were feeling helpless due to the loss of their family and wealth, started saying, 'Today, the lady who appeared mad and had come with our huge crowd was a demon with a monstrous form but had entered our group assuming a supernaturally beautiful form. She had already spread this extremely terrifying illusion.॥ 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)