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श्लोक 3.65.2-3  |
अथ काले बहुतिथे वने महति दारुणे।
तडागं सर्वतोभद्रं पद्मसौगन्धिकं महत्॥ २॥
ददृशुर्वणिजो रम्यं प्रभूतयवसेन्धनम्।
बहुपुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम्॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् बहुत समय बीतने पर एक विशाल एवं भयानक वन में पहुँचकर उन व्यापारियों ने एक महान् सरोवर देखा, जिसका नाम पद्मसौगंधिक था। वह सब ओर से शुभ प्रतीत हो रहा था। उस सुन्दर सरोवर के पास घास और ईंधन प्रचुर मात्रा में थे, तथा वहाँ फूल और फल भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। उस सरोवर पर अनेक पक्षी रहते थे॥2-3॥ |
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| Thereafter, after a long time, reaching a huge and dreadful forest, those merchants saw a great lake, whose name was Padmasaugandhik. It appeared auspicious from all sides. There was abundance of grass and fuel near that beautiful lake, flowers and fruits were also available there in abundance. Many birds lived on that lake.॥2-3॥ |
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